काव्य

आह……

अभी तो मैंने माँ की लोरिया भी सुनी नहीं, नहीं सुनी मैंने दूर परियों के देश की कहानियाँ !

अभी तो मैंने सीखा नहीं था खिलखिलाना और महकने मे तो था समां, हवा से नहीं की थी अठखेलिया !

अभी तो मैंने सीखें भी नहीं बंद आँखों से देखने सपनें, उस से पहले ही मुझे क्यूँ हमेशा के लिए दिया सुला !

अभी तो मैंने समझा और जाना भी नहीं था खुद को, क्यों मुझे करवा दिया हैवायनियत का सामना !

बस इतना ही समझा अब नहीं लौटना मुझ को यहाँ, जहाँ नहीं पिघलता है इंसान किसी की सुनके आह !

-Maya

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