काव्य

ढाई आखर प्रेम के, पढ़े तो पंडित हो जाये..

कितनी सुनी-अनसुनी कहानियाँ,
मिलना -बिछड़ना रूठना -मनाना
फिर सर रख के माँ के कंधो पे सो जाना ,
कुछ अंजानी और कुछ जानी पहचानी
प्रेम कहानियां

कुछ कहावते , कुछ किस्से
‘ढाई आखर प्रेम के पढ़े तो पंडित हो जाये ‘
पर फिर भी हम कुछ समझ नहीं पाए

ऐसे ही कुछ सकुचाये और शर्माए ,
हम अपने पिया के घर आये
बीते बरस बीत गयी जवानियाँ ,
फिर भी रही अनछुई सी मन में
कही कुछ निशानियां

वो गुस्ताखियाँ वो शौंकियाँ ,
वही रूठना -मनाना .तब लगा ऐसे ही सब पल तो हमने संग पिया के बिताये
अब समझ आया , क्यों कहते है ,
‘ढाई आखर प्रेम के पढ़े तो पंडित हो जाये ‘

-Maya.

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

Connecting to %s