काव्य

मेरे ख्वाब

उम्मीदों के सहारे तो जी लेते है लोग बरसो ,चाहे झूठी ही सही !खवाबो से भरी है आंखे ,नींदे चाहे टूटी ही सही !हूँ तेरा अब कह दिया तूने ,शिकयतें अब मेरी सारी झूठी ही सही !तेरे लिए हूँ जीता,जिंदगी चाहे मेरी रूठी ही सही ! -Maya.

काव्य

मेरा वजूद

दर्द कभी कभी मलहम बन जाता है ,सिखा जाता है जीने का सलीका !असली चहरे दिखा के अपनों के हमें ,खुद से खुद को मिला जाता है!मैं - मैं ही नहीं गर कोई मुझे कर दे खुद से जुदा ,मेरे वजूद को ही मैंने अपनी ताकत बनाया है !लुट जाता राहों में ही कही,हार जाता… Continue reading मेरा वजूद

काव्य

नन्हा परिंदा

आँगन में बैठी थी एक दिन मैं सोई सोई सी,लगता है अपने कुछ सपनों में खोई खोई सी।दूर आकाश में चिड़ियों का था शोर,नन्हे पर, लेकिन उड़ने की थी होड़।पल भर में बदल गया रंग आसमान का,छा गए काले बादल घनघोर।अब लौटना ज़रूरी है घरोंदों को ,इससे पहले की बरसाए नभ अपना आक्रोश।फिर खुदको ढूंढ… Continue reading नन्हा परिंदा

काव्य

पुरषार्थ

कहीं दूर बजती मन्दिर की घंटिया भी पर्यापत है मन में छुपे तमस के अंधकार को मिटाने के लिए, देव मूर्ति के दर्शन मात्र से समस्त जीवन के पाप क्षीण हो जाते हे सदा के लिए, रेगिस्तान की तपती रेत पर पानी की एक बूँद भी जीवन को बचाने की क्षमता रखती है, सदियों से… Continue reading पुरषार्थ

काव्य

आधा अधूरा सा प्यार…

आधे अधूरे से सब काम है तुम्हारे , कभी भूल जाते हो चाबियाँ, कभी घड़ी, या ये सब है मुझे छेड़ने के बहाने ! आधी अधूरी सी महुब्बत भी है बोल कर जो कभी कही ही नहीं, वो बात भी अभी अधुरी सी है ! आधा अधूरा सा प्यार जाताना, कुछ कहना और कुछ चुप… Continue reading आधा अधूरा सा प्यार…

काव्य

साड़ी

असली सुन्दरता छुपी है, एक सुंदर रंगीन साड़ी में ! माथे को ढकता पल्लु, सम्मान का एहसास कराता है ! गर्दन से सरकता आँचल मातृत्व को दर्शता, फिर लिपट कर कमर पर, डोलता चाबी का एक गुच्छा, जिम्मेदारियाँ सिखाता है, साड़ी की लहराती प्लीट्स, दुःख और सुख में एक सामान रहना सिखाती है! और फिर… Continue reading साड़ी

काव्य

करहाता अंतर मन

कुछ टूटता, कुछ सिसकता सा, अंतर मन में रहता है ! कोई मुझ को जब, अपना कहता है, क्यों वो झूठा लगता है ! कुछ सुलगता , कुछ करहाता , रूह को निगलता सा लगता है ! मुझे आजकल न जाने क्यों, डर अपनों से ही लगता है ! कुछ खोने का, कुछ छूट जाने… Continue reading करहाता अंतर मन

काव्य

अनकहे सपने !!!

कुछ अनकहे सपने, क्यों पलकों के नीचे दबे से रह जाते है ! कुछ अनकहे से अल्फ़ाज़, क्यूँ होठों तक आते आते मन मे ही रह जाते है ! कहना होता है जब बहुत कुछ, तो क्यूँ जुबान साथ नहीं देती ! क्यों आँखों के आंसू भी, कभी कभी बहने से पहले सूख जाते है… Continue reading अनकहे सपने !!!

काव्य · Thoughts

जिसका सब मोल हुआ

बोल बोल के सब बोल दिया,पूरा डिब्बा खोल दिया,खुला डिब्बा ना किसी काम का,बंद में माल भरा,अब तोल ज़रा तू क्या बोल दिया,अब तोल बड़ा के मोल बड़ा,खाली डिब्बा खोल हुआ,सोच जरा क्या था इसमें,जिसका सब मोल हुआ!!! -Maya

काव्य

याद

जब मैं था तो तरसता था,की मेरी बात तो हो! अब जब नही हूँ,तो हर जुबां पे नाम मेरा है!तुम याद मुझे करते हो या नहीं,पर मुझपे तरस खाने का,ये इंतजाम अच्छा है!-Maya